अमेरिकी अर्थ व्यवस्था का जनाज़ा और रहबर की भविष्यवाणी / रिपोर्ट स्पर्श देसाई

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             【मुंबई / रिपोर्ट स्पर्श देसाई】



आज भी चापलूसी और मतलब से भरी इस दुनिया में अल्लाह के ऐसे नेक बंदे मौजूद हैं जिनकी दुआओं को अल्लाह अपनी आख़िरी हुज्जत के वसीले से क़बूल करता है ।
इतिहास में पहली बार वैश्विक मंदी में पहली बार तेल की क़ीमत माइनस में जा पहुंची, यानी जिसका मतलब यह है कि फ़्री में तेल ख़रीदने को भी कोई तैयार नहीं है ।
अमेरिका का तेल स्टॉक और उससे जुड़ी कई कम्पनियां, फ़ैक्ट्रियां और उससे जुड़े करोड़ों लोग देश की आर्थिक स्थिति समेत बर्बादी की कगार पर आ गए हैं।
ईरान के इस्लामी इंक़ेलाब के रहबर आयतुल्लाह ख़ामेनई ने इस बात की तरफ़ देश की हुकूमत के लोगों और अधिकारियों से बात करते हुए दो दहाई पहले ही इशारा करते हुए यह कहा था कि ईरान की अर्थव्यवस्था यहां के तेल पर 1% भी निर्भर न रहे।
रहबर की दूसरी भविष्यवाणी यह थी कि ट्रंप का मिडिल ईस्ट ग्रेट प्लान का ख़ात्मा उसकी अपनी ज़िंदगी में होगा। तीसरी भविष्यवाणी यह कि अमेरिका बहुत जल्द अपने आंतरिक मामलों को लेकर कमज़ोर हो जाएगा और पूरी दुनिया पर क़ब्ज़े का अमेरिकी घमंड ख़ाक में मिलकर रह जाएगा। किसी बुद्धिजीवी का बेहतरीन जुमला कि पत्थरों का दौर पत्थरों की कमी या कोयले का दौर कोयले की कमी की वजह से ख़त्म नहीं हुआ बल्कि बदलते हालात ने उन दौरों को ख़त्म कर दिया। बिल्कुल इसी तरह तेल का दौर भी तेल की कमी की वजह से नहीं बदलते दौर और हालात उसका जनाज़ा निकालेंगे। जिस तेल की ख़ातिर अमेरिका ने पूरी दुनिया में ख़ून की होली खेली आज अल्लाह की क़ुदरत ने उसी तेल को अमेरिका के ताबूत की एक अहम कील बना दिया।
आरिफ़े जलील, आलिमे बा अमल आयतुल्लाह हसन ज़ादेह आमुली के जुमले याद आ रहे हैं जो उन्होंने रहबर के लिए फ़रमाए थे ।" कि अपने कानों को रहबर के लबों पर रखिए, मुझे मुकम्मल यक़ीन है कि इस अज़ीम शख़्स (रहबर) के कान इमाम महदी अ.स. के लबों पर है"।
यानी ऐसे मुश्किल समय में रहबर को इमाम ज़माना अ.स. की रहनुमाई हासिल है।  ख़ासकर शिया जवानों से और सभी मुसलमानों से अपील है कि ऐसे आलिम की क़द्र करें जिसकी ज़िंदगी का सारा सुख दुख पूरी उम्मत का सुख दुख हो। आज बेकार की बकवास कर के लोगों को गुमराह करने वाले उलमा बन कर घूमने वाले लोगों का दौर ख़त्म हो रहा है।
लोग समझ रहे हैं कि हक़ीक़ी दीन केवल बातों का नहीं बल्कि अमल का नाम है। इसलिए आइए आज उन उलमा की क़द्र करें जो सच में मासूमीन की सीरत पर अमल करते हैं। आज अगर हम उन उलमा की क़द्र न कर पाए तो कल इमाम अ.स. के ज़ुहूर के समय पर उनकी अज़मत और फ़ज़ीलत समझने और इताअत करने से महरूम रहेंगे, क्योंकि हमने इताअत और क़द्र करना सीखी ही नहीं होगी। ख़ुदाया हमें इमाम के मददगारों में शामिल फ़रमा।【 इस्लाम वर्ल्ड से 】


रिपोर्ट स्पर्श देसाई √●Metro City Post●News Channel●के लिए...

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